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Lanka’s Sleeping Demon Kumbhakaran joins mattress brand Wakefit as Chief Sleep Officer

In this exciting role, the greatest sleep influencer on Earth will officially test the mattresses, and they will be dispatched to a customer only once #ApprovedbyKumbhakarn. 

New Delhi, October 18, 2021: Wakefit has appointed Kumbhakarn (KK) as the Chief Sleep Officer on October 12, 2021, and in this role, he will be officially “testing” all Wakefit mattresses before they are delivered at a customer’s doorstep.

“I am the official “tester” 👮 of Wakefit mattresses. No mattress shall show up at your doorstep without being #ApprovedbyKumbhkaran. If it reaches slightly late, then you can blame it on me. Woh kya hain na, I am quite meticulouzzz. 😉,” says the sleeping demon on his appointment as CSO, Wakefit. 

The official communication announcing KK’s appointment as CSO, Wakefit.

The reasons for joining Wakefit are obvious. His work days are gonna be sleep days, and who wouldn’t want that. “At my previous workplace, they often caught me sleeping 😴 on the job. It was against the rules, they said. Pfft! They were the worst. Believe it or not, once they made a thousand elephants walk over me to wake me up. 😒 Speak of toxic bosses, right? Well, mine was a demon so,” says KK, adding how his previous employer often shamed him for his sleeping habits.   

But he is glad that his passion has finally been recognized by the wonderful folks at Wakefit. He thanked Wakefit founder Ankit Garg and co-founder Chaitanya Ramalingegowda for recruiting him for this vacation… ahem, position. 

“I am highly enthuzzziastic about sleep. I am a total foodie and believe that one must have the cake and eat it too, basically, eat cake twice! My jokes make me chuckle even in my sleep. My favorite saying is, May the snores be with you. Yes, believe it or not, Obi-Wan Kenobi stole it from me,” KK proudly proclaims about his biggest strength, the power to have a sound sleep.

As morale booster in Ravana’s Lankan Army, he had witnessed 13 days of absolute chaos. Calling it a professional mistake, KK says the stint taught him that he can’t lose sleep over someone else’s whims and fancies. “I enjoyed the first few days, but the boss expected too much of me. If you think your boss is two-faced, mine was ten-faced! Also, no chai-sona breaks. Can you believe that? What were they thinking?,” he quips. 

KK had also delivered a BED Talk on this professional mistake. It has more than 10 million hits so far.

“If all of us could learn one thing from Kumbhkaran is laser sharp focus on the task at hand. Absolutely hates multitasking and hustle. Lots to learn from him and his inputs have really benefited our business.” 

Prateek Malpani, Head Of Brand at Wakefit

Talking about his growing up years in Lanka where he was just another friendly daemon, he says, “My job basically entailed sleeping, and boy was I the best in the business! But alas, my joy was short-lived. I mean just a couple of centuries, but they went by so quickly, like a few years. 😒 Good old days. Anyway, I am keeping my face toward the sun, because unlike you, the sun got nothing on my sleep. 😏😬

KK is a proud recipient of three awards, Asian Hypnos, Asian Thanos and Philo-sooo-pher of the Year. At Wakefit, he is currently working on Project Operation Cheap Thrill. He holds a Doctor of Philosophy from Narad Muni University.  

“Kumbhkaran is a great team leader and runs tight meetings with clear agendas – everyone gets to sleep. Such an inspiration!”

Mosab A., Growth & Strategy at Wakefit
Movies, Masti and Snore… yes, that’s what keeps Wakefit’s CSO on his toes, ahem, bed.

The greatest sleep influencer on Earth, Kumbhakaran has proven experience in quality assurance, philosophy, army and sleep training, that will come in handy in his current role as Chief Sleep Officer. 

Click here: https://bit.ly/3DBOCSi to interact with KK and see for yourself.

Returned Undelivered

… a letter for my dearest and now departed friend, Aashish

प्रिय आशीष,
बचपन में तुम्हारी शैतानियाँ। लड़कपन में तुम्हारी इश्क़ की कहानियाँ। और फिर जवानी में तुम्हारे हाथ की बनी मिठाइयाँ। आज बहुत याद आ रही है तुम्हारी, दोस्त ।
पिछले कुछ सालों में आदत सी हो गयी थी तुम्हारी बतकही की। चाहे तुम कितना भी व्यस्त रहते थे, चाहे दुनिया के किसी भी कोने में होते थे, पर हर दूसरे दिन एक बार फ़ोन खटका ही दिया करते थे, कभी हाल-चाल जानने के लिए, कभी कुछ बताने के लिए, कभी अपना दिल हलका करने के लिए और कभी मेरी बेवजह वाली बकवास सुनने के लिए । तुम्हारे इंडिया लौट आने के बाद तुमसे हर अगले दिन बात हो जाया करती थी।और बातें भी क्या हुआ करती थी बस यूँ ही इधर-उधर की बकर, बेवजह की हंसी-ठिठोली और कुछ दूर एक साथ बचपन के शहर की यादों में खो जाना। बहुत अच्छा लगता था । आज फिर तुम्हारी कमी बहुत ज्यादा महसूस हो रही है क्यूंकि तुम्हारे जैसा और कोई नहीं था और न होगा, आशीष।
तुमने उस दिन (चार अप्रैल) को कितनी बड़ी धमकी दी थी मुझे, याद है तुम्हें? “अगर आज तू मुझसे मिलने सोहना नहीं आयी तो मैं तुझसे ज़िन्दगी भर फिर कभी बात नहीं करूँगा! याद रखना, शिल्पीजी (इस नाम से सिर्फ तुम ही बुलाते थे मुझे)।” तुम और तुम्हारी इमोशनल ब्लैकमेलिंग ! इनके सामने मेरी क्या बिसात। दिन के बारह बजे थे और फ़ोन पर तुम्हारी धमकी सुनकर मेरे दिल में बारह बज गए। फिर क्या था। तुमसे फिर कभी न बात करने से बड़ी और कोई सज़ा नहीं हो सकती है मेरे लिए, मेरे दोस्त। तुम्हें फ़ोन कर बता दिया कि हम सब आ रहे हैं। तुरंत बच्चों को तैयार करवा कर हम सपरिवार तुम्हारे आदेशानुसार सोहना के लिए रवाना हो गए। तब तक दोपहर के दो बज गए थे। दूरी बहुत ज्यादा थी। तुम हर दस मिनट के बाद पूछ रहे थे, “अब कहाँ?” “और कितनी दूर?” “कब पहुँचोगी?” आज सब कुछ बहुत याद आ रहा है।
पौने चार बज गए थे हमें सोहना पहुँचते-पहुँचते और हम चारों को वहां देख तुम कितने खुश हुए जैसे एक रूठे हुए बच्चे के हाथ में उसकी प्यारी चॉकलेट थमा दी हो किसी ने और उसे पा कर उस बच्चे की बांझे खिल गयी हो। तुमने दोनों बच्चों कि जिम्मेदारी मेरे हाथों से ले ली और मुझे हिदायत दी, “अब तू सिर्फ रिलैक्स कर। यहाँ बैठ, और सिर्फ खा-पी।” शायद यह कह कर तुम मुझे आने वाले तूफ़ान से जूझने के लिए तैयार कर रहे थे। तुम्हारे साथ बच्चों ने खूब मस्ती की। आज भी उन्हें तुम बहुत याद आते हो। तुमने उन्हें चॉपस्टिक से नूडल्स खाना सिखाया और यह शायद उनके लिए एक अनमोल सीख है। और हमेशा रहेगी।
हम तुम फिर यूँ ही शाम की हलकी धूप में बैठकर हमेशा की तरह फिर से बकर करने में जुट गए। कितने देर तक यूँ ही बैठे रहे। तुमने मेरी वाली कड़क चाय बनवाई और प्यार से एक नहीं दो कप मेरे लिए मंगवाई।वह शाम, तुम और तुम्हारी बातें आज बहुत याद आ रही हैं।
दीवार पर एक काली छिपकली देख कर तुमने हाउसकीपिंग वाले बन्दे को बुला कर खूब डांटा और शायद उसके आने से पहले तुम्हारे गुस्से से डर कर वह छिपकली तुरंत गायब भी हो गयी थी । मैंने हंस कर तुम्हें बताया कि दो दिन पहले मुझे और अजय को सपने में छिपकली खुद पर रेंगती दिखी थी। तुम भी हंस कर बोले, “और तू डर गयी?” मैंने कहा, “नहीं, पर कहते हैं कि ऐसा सपना देखने से इंसान की जान को खतरा होता है।” तुम और जोर से हंस कर मेरी खिल्ली उड़ाने लग गए।
बात आयी गयी कर तुम हमें पूल के पास ले गए। दिन खत्म होने को था पर तुम्हारी कहानियाँ खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। बचपन-जवानी-बुढ़ापा (क्यूंकि हम और तुम हमेशा एक-दुसरे से यह कह कर अपनी ४०+ उम्र का मजाक उड़ाते थे) तुमने मुझे तीनों पड़ावों के बहुत सारे किस्से सुनाये थे उस दिन । आज भी सब कुछ याद है।
बातों-बातों में तुमने अपने युवा सहकर्मी की कुछ दिन पहले (ग्यारह मार्च) को सड़क दुर्घटना में हुई मौत के बारे में बताया। तुम उसके अचानक यूँ ही चले जाने से बहुत दुखी थे। यह कहते-कहते तुम्हारी बड़ी-बड़ी भूरी आखें आंसुओं से भर कर धुंधली हो गयीं थी । आंसुओं को तो तुमने किसी तरह रोक लिया पर तब तक तुम्हारी आवाज ने धोखा दे दिया। उस सहकर्मी के पार्थिव शरीर को देख कर उसकी माँ की हालत बताते हुए तुम जैसे फिर से टूट गए थे। ऐसा लग रहा था कि तुम्हें यकीन नहीं हो रहा था कि वो अब फिर कभी लौट कर नहीं आएगा। तुम्हें क्या पता था कि आज मेरी भी वही हालत है।
शाम हो चली थी। हमने भी तुमसे घर जाने की अनुमति मांगी। तुमने साथ में मेरा वाला चॉकलेट केक, मिठाइयों का डिब्बा और मीठी यादों के साथ हमें विदा किया।आखरी बातचीत में साथ में ऋषिकेश जाना तय हुआ था।इस बात पर तुमने कहा था, “पक्का, पक्का।” याद है न, तुम्हें? पर तुम तो अकेले ही चले गए। तुम्हें शायद अनहोनी का पूर्वाभास हो गया था पर मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हुआ है तुम्हारे नहीं होने का।
अगले दिन तुमने शाम को पांच बजे के करीब फ़ोन कर पूछा, “तू रिलैक्स हुई। आजा फिर। बच्चों की चिंता मत कर। मैं उनकी देखभाल कर लूँगा। तू सिर्फ अपना ख्याल रख। बस खुश रह।” मैंने कहा, “अरे, कल ही तो आई थी सोहना। अब कल फिर आ जाऊँ?” हम-तुम यूँही फिर थोड़ी देर बकर करते रहे और जल्दी मिलने का वादा करके फ़ोन रख दिया। बस शायद यह पूर्णविराम था। मेरे और तुम्हारे लिए।
उसी हफ़्ते हम-तुम बीमार पड़े। दिव्या को मैंने अचानक आठ तारीख को फ़ोन किया तो तुम्हारी तबियत के बारे में मालूम हुआ। ऐसा हमेशा होता था कि जब भी तुमसे बात नहीं हो पाती थी तो उससे तुम्हारा हाल-चाल पूछ लिया करते थे। पर उस दिन क्यों तुम्हें नहीं पर उसे फ़ोन लगाया यह समझ नहीं आया। तुम्हारी तरह, तब तक हम भी सपरिवार बुख़ार कि चपेट में आ गए थे। फिर दस तारीख को दिव्या से यह पता चला कि तुम्हारा कोविड टेस्ट नेगेटिव है तो बहुत राहत मिली। पर यह फाल्स नेगेटिव था। हमने तब तक टेस्ट नहीं करवाया था। ग्यारह को रविवार होने कि वजह से गुरुग्राम में सभी लैब बंद थे तो हम सपरिवार बारह तारीख को टेस्ट करवाने गए।
वहां से वापस घर पहुंचे ही थे कि दिव्या का कॉल आया। पर कॉल मिस हो गया। तब तक दोस्तों के मेसेजस आने लगे। पर यकीन नहीं हुआ। तुम चले गए थे। दूर, बहुत दूर। अपना वादा तोड़ कर। दिव्या, अभिनव और अर्णव, मीनू को अकेला छोड़ कर। तुमने कहा था कि अगर मैं तुमसे मिलने नहीं आई तो तुम मुझसे बात नहीं करोगे पर मैं मिलने तो आई थी उस दिन पर तब भी तुम मुझसे अब कभी बात नहीं करोगे। ऐसा कोई करता है क्या, दोस्त? मुझे इतनी बड़ी सजा दे दी ? क्यों?
तुम्हारी याद में,
शिल्पी

(वर्तनी और व्याकरण की गलतियों के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं)

वो कह के चले इतनी मुलाक़ात बहुत है
मैंने कहा रुक जाओ अभी रात बहुत है
Handsome is as handsome does… Aashish Juyal.

Love Unfinished

Aashish and Divya Juyal

Hotel management graduates Divya Gupta and Aashish Juyal were the perfect strangers for each other till fate played Cupid and brought them together for life. It was their first job at The Grand Hyatt in New Delhi way back in 2000, but the duo stayed oblivious to each other’s presence for almost two years. “We had common friends but had never spoken to each other before till that cold, rainy night in December 2002. Aashish’s father was ailing and hospitalised, and he didn’t have enough money for some emergency medical procedure. He came to my home as a last resort to borrow some money. I handed him my ATM card and PIN without even knowing him well enough, and I guess that gesture surprised him; that moment was love at first sight for him,” says Divya with a smile, adding, “I took longer to accept and come around.” 

Inked in L.O.V.E.

Aashish’s father passed away soon after, and he had to shoulder the responsibility of his family of three that included his younger unmarried sister and mother. Juyal got a job offer in Dubai, and he moved there in 2003. Divya took up a lucrative assignment at Muscat during the same time. While Divya hailed from Meerut, Aashish came from a conservative Brahmin family in Rishikesh, and his mother was dead against their relationship. “My family had no issues with my intercaste marriage. We were on holiday in India in 2006 when it so happened that my father insisted on getting us hitched. Aashish’s mother threw a fit and refused to be a part of the celebration. She reluctantly agreed after a lot of cajoling,” remembers Divya. Aashish was sure that Divya was the girl he wanted to spend the rest of his life with, come what may. He moved mountains to coax his mother who had reservations against the intercaste alliance. “But he had told me long ago that come what may, I will bring you home as my wife, but making a place in the family will be your responsibility,” reminisces Divya.

Aashish and Divya celebrating Durga Puja in Dhanbad in 2018.

In all these years, she’s not only made a place in the family but also in their hearts. Her mother-in-law’s fondness for her grew with every passing moment, and she realized that caste is the most irrelevant subject that works best as a tool to divide. “Aashish used to always tell others, ‘Divya used her caste to unite the family’,” says Divya. Aashish’s mother’s love and blessings made their marital life beautiful. She was ailing for a long time, and Divya took it upon herself to take care of her, leaving her full-time job, and spending days and nights cleaning her pee, poop, and vomit, bathing and feeding her, all alone while Aashish stayed back in Dubai to fend for the family. “She breathed her last in my arms,” says Divya.  

Divya and Aashish.

Today, the couple would have celebrated their 15th year of marital togetherness, but again fate had other plans, and Aashish left for his heavenly abode on April 12, 2021. “He always used to say, ‘Divya will manage this, that and everything. I guess that’s why he chose to leave me all alone,” she says with tears welling up in her eyes.

 

Aashish and Divya with their children, Abhinav and Arnav.

The couple has two sons who are Divya’s hope and happiness. She is trying hard to pick up the pieces and love for her children, one day at a time. May love give her ample strength and make her life beautiful and living worthwhile.