All posts by Shillpi A Singh

About Shillpi A Singh

I am a part-time procaeffinator and full-time writer. The more things change, the more they stay the same. I started my career as a journalist in the early-noughties and worked in various capacities in leading national publications - The Asian Age, The Times of India, The Hindustan Times (as it was then), India Today - across New Delhi and Mumbai for more than 15 years. I dabbled in corporate communications on two occasions, firstly with the National Bank for Agriculture and Rural Development in Mumbai, and then again with The Energy and Resources Institute in New Delhi, in between. I returned to the fold as a freelance journalist in 2016 and over the past few years, I have contributed to many newspapers and magazines, including Gaon Connection, The New Indian Express, Chennai; TheMorning Standard, New Delhi; India Perspectives, MEA’s magazine; Shubh Yatra, Air India’s in-flight magazine; The Free Press Journal, Mumbai; Vistara, AirVistara’s in-flight magazine; Rail Bandhu, Indian Railways’ on-board magazine; TruJetter, TruJet Airlines’in-flight magazine; NewsGram.com, a US-based news website; eShe.in, an online magazine for women; The Times of Amma, an online magazine for women; News18.com, a news portal; Sbcltr.in, an online magazine; DailyO, an online website; eastindiastory.com and apotpourriofvestiges.com. I also run my parenting website, theparentslogue.com. I mostly write to while away my time and at times to explore the devilry of my idle mind, on anything and everything that tickles my grey matter. I hold a PG Degree in English Journalism from IIMC, New Delhi, and Post Graduate Certificate in Marketing and Brand Management from MICA, Ahmedabad.

A trip to the Last Frontier

Alaska has many pleasant surprises in store, says avid globetrotter and travel writer Upasna Prasad. 

My family was holidaying in Vancouver, Canada, in June 2015, from where we decided to go on a week-long Caribbean cruise trip across Alaska. Our first halt was Icy Strait Point, then Juneau and finally Ketchikan before retreating to Vancouver.

Icy Strait Point.

Icy Strait Point: After being on the sea for a full two days with no land in sight across the North Pacific Ocean, we reached Hoonah village, Alaska’s largest Native Tlingit village, on the third day. Icy Strait Point was the name of the port where our ship disembarked. We took the exciting Humpback Whale watching boat trip in the Pacific’s nutrient-rich, bountiful, icy cold waters. The whales are plentiful here, so we did spot a few.

Our Humpback Whale watching boat trip.

Next, we headed to Tongass National Park on a local bus for coastal brown bear sightings. Alas, we did not have a glimpse of the bear! We wore warm-layered clothing and a waterproof jacket with comfortable shoes to enjoy the open-air adventure. Remember, when in Alaska, do not forget your cameras and binoculars!

The Gray Line of Alaska.

Juneau: In Alaska, there are many spectacular glaciers and mountains to view. So, upon reaching Juneau, the capital city of Alaska and an important hub for gold diggers; we did not waste time. After finishing our scrumptious lunch of delectable Dungeness crabs, grilled corn and salmon, we headed to view the spectacular Mendenhall Glacier. The glacier has retreated a mile every year since 1930. We also visited a visitor centre nearby with a wealth of information on plants, animals and geology.

Mendenhall Glacier.

Since it was a day stopover, we had to make the most of it. We hired a Ranger who showed us old gold mines in the mountains. We continued with our adventure with a helicopter sightseeing at Douglas Island. It was a phenomenal experience over the Juneau ice fields in the picturesque Norris Glacier. The pilot was well informed too! The helicopter halted at Norris Glacier for a mushing time, Dog Sledding!

A helicopter sightseeing at Douglas Island.

The dog teams welcomed us and took us on a thrilling trip on wheeled sleds. Alaskan huskies pulled us across fields blanketed by snow and surrounded by snow-capped mountains. We were given snow boots to wear over our shoes to walk comfortably.

The dog sled tour.

It was a fabulous experience. The dog sled tour is long over, but the memories will remain with us forever.

Ketchikan: Rains welcomed us in Ketchikan, a colourful city of timber, totem poles and salmon. Totem poles are beautifully carved, painted logs of wood, vertically mounted and constructed by the North American Tlingit clan. In fact, colourful Totem poles adorn the whole city. Each animal or spirit carved on the pole has a meaning and is part of an important story or myth.

The totem pole in Ketchikan.

The Alaskan salmon have exciting lives as they return to their birth stream or river after spending several years in the Pacific. Our Ranger told us that brown bears come down from the mountains towards the rivers or streams searching for salmon. 

Crusing along.

By evening, we bid adieu to this colourful historic city of Ketchikan and embarked on our cruise for our last lap of the journey back to Vancouver.

Blue-finned is out of the red

The article on Mahseer also called the tiger of the freshwater was published in The Free Press Journal, Mumbai, in the edition dated September 19, 2021.
https://www.freepressjournal.in/amp/weekend/saving-mahseer-how-various-conservation-initiatives-have-saved-the-tiger-of-freshwater-from-extinction

Returned Undelivered

… a letter for my dearest and now departed friend, Aashish

प्रिय आशीष,
बचपन में तुम्हारी शैतानियाँ। लड़कपन में तुम्हारी इश्क़ की कहानियाँ। और फिर जवानी में तुम्हारे हाथ की बनी मिठाइयाँ। आज बहुत याद आ रही है तुम्हारी, दोस्त ।
पिछले कुछ सालों में आदत सी हो गयी थी तुम्हारी बतकही की। चाहे तुम कितना भी व्यस्त रहते थे, चाहे दुनिया के किसी भी कोने में होते थे, पर हर दूसरे दिन एक बार फ़ोन खटका ही दिया करते थे, कभी हाल-चाल जानने के लिए, कभी कुछ बताने के लिए, कभी अपना दिल हलका करने के लिए और कभी मेरी बेवजह वाली बकवास सुनने के लिए । तुम्हारे इंडिया लौट आने के बाद तुमसे हर अगले दिन बात हो जाया करती थी।और बातें भी क्या हुआ करती थी बस यूँ ही इधर-उधर की बकर, बेवजह की हंसी-ठिठोली और कुछ दूर एक साथ बचपन के शहर की यादों में खो जाना। बहुत अच्छा लगता था । आज फिर तुम्हारी कमी बहुत ज्यादा महसूस हो रही है क्यूंकि तुम्हारे जैसा और कोई नहीं था और न होगा, आशीष।
तुमने उस दिन (चार अप्रैल) को कितनी बड़ी धमकी दी थी मुझे, याद है तुम्हें? “अगर आज तू मुझसे मिलने सोहना नहीं आयी तो मैं तुझसे ज़िन्दगी भर फिर कभी बात नहीं करूँगा! याद रखना, शिल्पीजी (इस नाम से सिर्फ तुम ही बुलाते थे मुझे)।” तुम और तुम्हारी इमोशनल ब्लैकमेलिंग ! इनके सामने मेरी क्या बिसात। दिन के बारह बजे थे और फ़ोन पर तुम्हारी धमकी सुनकर मेरे दिल में बारह बज गए। फिर क्या था। तुमसे फिर कभी न बात करने से बड़ी और कोई सज़ा नहीं हो सकती है मेरे लिए, मेरे दोस्त। तुम्हें फ़ोन कर बता दिया कि हम सब आ रहे हैं। तुरंत बच्चों को तैयार करवा कर हम सपरिवार तुम्हारे आदेशानुसार सोहना के लिए रवाना हो गए। तब तक दोपहर के दो बज गए थे। दूरी बहुत ज्यादा थी। तुम हर दस मिनट के बाद पूछ रहे थे, “अब कहाँ?” “और कितनी दूर?” “कब पहुँचोगी?” आज सब कुछ बहुत याद आ रहा है।
पौने चार बज गए थे हमें सोहना पहुँचते-पहुँचते और हम चारों को वहां देख तुम कितने खुश हुए जैसे एक रूठे हुए बच्चे के हाथ में उसकी प्यारी चॉकलेट थमा दी हो किसी ने और उसे पा कर उस बच्चे की बांझे खिल गयी हो। तुमने दोनों बच्चों कि जिम्मेदारी मेरे हाथों से ले ली और मुझे हिदायत दी, “अब तू सिर्फ रिलैक्स कर। यहाँ बैठ, और सिर्फ खा-पी।” शायद यह कह कर तुम मुझे आने वाले तूफ़ान से जूझने के लिए तैयार कर रहे थे। तुम्हारे साथ बच्चों ने खूब मस्ती की। आज भी उन्हें तुम बहुत याद आते हो। तुमने उन्हें चॉपस्टिक से नूडल्स खाना सिखाया और यह शायद उनके लिए एक अनमोल सीख है। और हमेशा रहेगी।
हम तुम फिर यूँ ही शाम की हलकी धूप में बैठकर हमेशा की तरह फिर से बकर करने में जुट गए। कितने देर तक यूँ ही बैठे रहे। तुमने मेरी वाली कड़क चाय बनवाई और प्यार से एक नहीं दो कप मेरे लिए मंगवाई।वह शाम, तुम और तुम्हारी बातें आज बहुत याद आ रही हैं।
दीवार पर एक काली छिपकली देख कर तुमने हाउसकीपिंग वाले बन्दे को बुला कर खूब डांटा और शायद उसके आने से पहले तुम्हारे गुस्से से डर कर वह छिपकली तुरंत गायब भी हो गयी थी । मैंने हंस कर तुम्हें बताया कि दो दिन पहले मुझे और अजय को सपने में छिपकली खुद पर रेंगती दिखी थी। तुम भी हंस कर बोले, “और तू डर गयी?” मैंने कहा, “नहीं, पर कहते हैं कि ऐसा सपना देखने से इंसान की जान को खतरा होता है।” तुम और जोर से हंस कर मेरी खिल्ली उड़ाने लग गए।
बात आयी गयी कर तुम हमें पूल के पास ले गए। दिन खत्म होने को था पर तुम्हारी कहानियाँ खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। बचपन-जवानी-बुढ़ापा (क्यूंकि हम और तुम हमेशा एक-दुसरे से यह कह कर अपनी ४०+ उम्र का मजाक उड़ाते थे) तुमने मुझे तीनों पड़ावों के बहुत सारे किस्से सुनाये थे उस दिन । आज भी सब कुछ याद है।
बातों-बातों में तुमने अपने युवा सहकर्मी की कुछ दिन पहले (ग्यारह मार्च) को सड़क दुर्घटना में हुई मौत के बारे में बताया। तुम उसके अचानक यूँ ही चले जाने से बहुत दुखी थे। यह कहते-कहते तुम्हारी बड़ी-बड़ी भूरी आखें आंसुओं से भर कर धुंधली हो गयीं थी । आंसुओं को तो तुमने किसी तरह रोक लिया पर तब तक तुम्हारी आवाज ने धोखा दे दिया। उस सहकर्मी के पार्थिव शरीर को देख कर उसकी माँ की हालत बताते हुए तुम जैसे फिर से टूट गए थे। ऐसा लग रहा था कि तुम्हें यकीन नहीं हो रहा था कि वो अब फिर कभी लौट कर नहीं आएगा। तुम्हें क्या पता था कि आज मेरी भी वही हालत है।
शाम हो चली थी। हमने भी तुमसे घर जाने की अनुमति मांगी। तुमने साथ में मेरा वाला चॉकलेट केक, मिठाइयों का डिब्बा और मीठी यादों के साथ हमें विदा किया।आखरी बातचीत में साथ में ऋषिकेश जाना तय हुआ था।इस बात पर तुमने कहा था, “पक्का, पक्का।” याद है न, तुम्हें? पर तुम तो अकेले ही चले गए। तुम्हें शायद अनहोनी का पूर्वाभास हो गया था पर मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हुआ है तुम्हारे नहीं होने का।
अगले दिन तुमने शाम को पांच बजे के करीब फ़ोन कर पूछा, “तू रिलैक्स हुई। आजा फिर। बच्चों की चिंता मत कर। मैं उनकी देखभाल कर लूँगा। तू सिर्फ अपना ख्याल रख। बस खुश रह।” मैंने कहा, “अरे, कल ही तो आई थी सोहना। अब कल फिर आ जाऊँ?” हम-तुम यूँही फिर थोड़ी देर बकर करते रहे और जल्दी मिलने का वादा करके फ़ोन रख दिया। बस शायद यह पूर्णविराम था। मेरे और तुम्हारे लिए।
उसी हफ़्ते हम-तुम बीमार पड़े। दिव्या को मैंने अचानक आठ तारीख को फ़ोन किया तो तुम्हारी तबियत के बारे में मालूम हुआ। ऐसा हमेशा होता था कि जब भी तुमसे बात नहीं हो पाती थी तो उससे तुम्हारा हाल-चाल पूछ लिया करते थे। पर उस दिन क्यों तुम्हें नहीं पर उसे फ़ोन लगाया यह समझ नहीं आया। तुम्हारी तरह, तब तक हम भी सपरिवार बुख़ार कि चपेट में आ गए थे। फिर दस तारीख को दिव्या से यह पता चला कि तुम्हारा कोविड टेस्ट नेगेटिव है तो बहुत राहत मिली। पर यह फाल्स नेगेटिव था। हमने तब तक टेस्ट नहीं करवाया था। ग्यारह को रविवार होने कि वजह से गुरुग्राम में सभी लैब बंद थे तो हम सपरिवार बारह तारीख को टेस्ट करवाने गए।
वहां से वापस घर पहुंचे ही थे कि दिव्या का कॉल आया। पर कॉल मिस हो गया। तब तक दोस्तों के मेसेजस आने लगे। पर यकीन नहीं हुआ। तुम चले गए थे। दूर, बहुत दूर। अपना वादा तोड़ कर। दिव्या, अभिनव और अर्णव, मीनू को अकेला छोड़ कर। तुमने कहा था कि अगर मैं तुमसे मिलने नहीं आई तो तुम मुझसे बात नहीं करोगे पर मैं मिलने तो आई थी उस दिन पर तब भी तुम मुझसे अब कभी बात नहीं करोगे। ऐसा कोई करता है क्या, दोस्त? मुझे इतनी बड़ी सजा दे दी ? क्यों?
तुम्हारी याद में,
शिल्पी

(वर्तनी और व्याकरण की गलतियों के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं)

वो कह के चले इतनी मुलाक़ात बहुत है
मैंने कहा रुक जाओ अभी रात बहुत है
Handsome is as handsome does… Aashish Juyal.

Follow COVID-19 safety protocols during Ganeshotsav this year

Ganesh Chaturthi is just around the corner. We are also excited to welcome Ganpati Bappa into our homes, but there is a constant worry of inviting people at home or celebrating the upcoming festivals in a crowded setting. Well, there goes a famous song, “There’s no place like home for the holidays,” and this classic English song seems more relevant in times today than ever before as we navigate the festival season in the COVID-19 era.

Most experts across the country have insisted that staying home is the best and safest option. That doesn’t make it sting less, though. After months of isolation, economic anxiety, and pandemic fatigue, it is entirely understandable that people are yearning for hugs from family members and meet-ups with friends.

But the reality remains that large parties/gatherings, travelling to see friends and family and brushing off masks and social distancing can have serious consequences – the impact of which will be felt beyond your circle. There is no need to celebrate festivals by gathering in a crowd; the festivities can be scaled down too. The good news is, with some modifications, you can still make the most out of our favourite time of the year. Most festivals bring hope and light – and we must hold onto this meaning all the more if we cannot celebrate them in the way we might have in the past. 

GUIDELINES TO FOLLOW SHOULD YOU HAVE A SMALL GATHERING AT HOME:

  • Make your event as safe as possible for guests; ventilate the rooms appropriately or host the event on the terrace/ balcony to enable natural ventilation.
  • Keep the gathering small and short.
  • Encourage people to wear masks and ensure enough space for each guest to maintain at least a 1-meter distance from others.
  • Help your guests follow COVID19 appropriate measures – provide masks, alcohol-based hand sanitiser or access to soap and water, tissues and bins with lids that close.
  • Follow guidance issued by local public health authorities before you plan a gathering.

IF YOU DO PLAN TO GO OUT, HERE’S WHAT YOU NEED TO KNOW TO REDUCE YOUR RISK OF ANY INFECTION, INCLUDING CORONAVIRUS.

  • All crowded places should be avoided; festivals should be celebrated with all precautions.
  • Meet people in open areas and maintain required distancing.
  • Wearing a mask is a must once you step out of the house.
  • Six feet or two meters of social distancing is compulsory.
  • Sanitize your hands frequently (for at least 20 seconds).
  • Go out with only your social bubble.
  • Spitting is strictly prohibited.
  • Even if you get stuck in a crowd by chance, make sure you are wearing a mask and avoiding face-to-face contact.
  • Wash your clothes with detergent after coming back home and also take a hot water bath.
  • Experts suggest that those with respiratory complaints or a weakened immune system must refrain from venturing out at any cost.
  • Consult a doctor without delay if you notice any symptoms after returning home.

THIS FESTIVE SEASON COULD BE CELEBRATED DIFFERENTLY LIKE THIS:

  • As a family, be there for each other – try to have conversations with family and friends. Maybe a virtual call or small gathering while maintaining social distancing can be done. Listen to how others are coping and act with empathy & understanding.
  • Gift-giving – we’re all in this together and you & your gifts can be a way to share your love with your family and friends.
  • Be aware of overindulging – regardless of whether we can have large celebrations or not, it’s important to keep an eye on what you’re drinking and eating.
  • Celebrating with children – this may be when your children usually get together with cousins or friends. You could try to keep them connected through video calls so they feel included. Spend more time with them, cook for them, and indulge in some fun activities with them.
  • Maintain traditions – you could try to stick to the traditions that you have in place. Whether it’s making a particular meal or decorating your home on a certain day, you can create a sense of normality by maintaining these traditions.

To conclude, we can’t become complacent and should not let our guard down until the maximum population gets fully vaccinated or we reach herd immunity. Till then, we can continue following our traditions and enjoy ourselves with our family and friends while following COVID-appropriate behaviour.

(Dr Sandeep Patil, Chief Intensivist, and Dr Sudhir Gore, Head-Emergency Medicine, Fortis Hospital, Kalyan)

Frequently feel dizzy? It could be vertigo.

Dr Pawan Ojha gives the lowdown on the disease of the vestibular system.

Do you often get a spinning feeling while lying down on your bed or when you are still? Often do you experience dizziness that disrupts your balance? This could be a sign of vertigo. Dizziness might imply vertigo, fainting, poor body balance, or even fits. Vertigo is a type of dizziness where you feel like spinning. These feelings may last from a few seconds to days and often worsen with movement.

WHAT CAUSES DIZZINESS? Vertigo is commonly caused by disease of the vestibular system. The vestibular system inside the inner ear helps in sensing our head position in space relative to the body, and works in an integrated manner with the brain to maintain body position. Vertigo can also result from diseases of the vestibular nerve or parts of the brain that deal with body balance.

IS VERTIGO A BIG PROBLEM? The diseases related to the inner ear and its nerve supply are generally considered less worrisome. ‘Benign Positional Vertigo’ often causes the most severe vertigo but can be treated easily by experts. It occurs when the calcium deposits of Otolith organs of the inner ear fall in the inner ear canals to cause short episodes of severe vertigo upon head movement, such as while lying down or getting up from the bed. Another important cause of vertigo is ‘Vestibular Neuritis’ which occurs due to viral infection or autoimmune disease of vestibular nerve, where vertigo, nausea, or vomiting can last up to several days. Meniere’s Disease is caused by a build-up of fluid in the inner ear tubes, causing episodic vertigo with ringing in the ears and hearing loss. The exact cause is unclear, a viral infection, an autoimmune reaction or a genetic component coule be the trigger. Many people who have migraine often complain of vertigo with or without headache, that is called ‘Vestibular Migraine.’ A neurologist can often easily identify and treat the underlying migraine to relieve vertigo.

WHAT’S THE MOST WORRISOME KIND OF VERTIGO? Vertigo that is caused by brain disease should be considered worrisome and treated on an urgent basis. Stroke is an important and serious condition causing dizziness. In a population-based study of more than 1,600 patients, 3.2% of those presenting to an emergency department with dizziness were diagnosed with a Stroke. Apart form this, brain infection, Multiple Sclerosis, hypothyroidism and other biochemical disturbances can cause vertigo even in the absence of fever.

So, one should not delay consulting a doctor as soon as one feels sudden dizziness. Warning signs for a serious cause of vertigo include severe headache, persistent vomiting and imbalance, double vision, vision problems, sudden hearing loss, or early signs of brain stroke (weakness or numbness in arm or leg , face drooping to one side, trouble while speaking or swallowing). People who are older than 60 years, with diabetes, hypertension, smoking and history of heart disease or brain stroke, should be extra careful. Doctors might require an urgent MRI of the brain to diagnose the brain problem and treat it in time.

TREATMENTS ARE AVAILABLE: Medications prescribed to relieve Vertigo include betahistine, antihistamines and anti-emetics. Benign Paroxysmal Positional Vertigo (BPPV) can be treated by physical repositioning procedures performed by expert doctors. Video-Nystagmography equipment might need to be used for complex cases. Special precautions in vertigo are limiting sodium intake, avoiding caffeine, chocolate, alcohol, and tobacco. If diagnosed in time, brain stroke can be effeciently treated with clot busters and/or interventional treatment. If vertigo is caused other serious problem, such as brain tumor or injury to the brain or neck, surgical treatment might be necessary to rectify those problems. Vestibular rehabilitation in the hands of expert physiotherapists forms an essential part of vertigo treatment. With correct diagnosis and treatment, most patients can be relieved of their vertigo effectively.

(Dr Pawan Ojha is Senior Neurologist-Hiranandani Hospital, Vashi-A Fortis network Hospital)

बचपन, बारिश, और सियार का ब्याह

… क्यूंकि आज यूँ ही मेरा दिल फिर ऐसी बारिश के लिए बेचैन हो गया।

आजकल मेरे बचपन के शहर धनबाद में फिर वैसी ही बारिश हो रही है जैसे सियार का ब्याह हो रहा हो। हाँ, आपने ठीक पढ़ा। हमने तो अपने बचपन ये कहावत खूब सुना था। दादी कहा करती थी – जब धूप में बारिश होती थी तो कहीं दूर जंगल में सियार का ब्याह हो रहा होता है।या यह समझ लीजिये, जब सूरज बादलों के बीच से कहीं झाँक रहा हो और खिली धूप में बस थोडी देर के लिए जोर दार बारिश हो जाये तो उसे सियार का ब्याह होना कहते है।

A view of the rainbow from the terrace of my home in Dhanbad. Photo Credit: Shruti

सिर्फ दादी ही नहीं, मैंने कई लोगों को यही कहते सुना है।और उसके बाद इन्द्रधनुष भी दिखता था। मानो जैसे दुल्हन के लिए बहुभात का आयोजन प्रकृति ने स्वयं ही कर दिया हो। उन दिनों ऐसे मंज़र से ज्यादा खूबसूरत और कुछ नहीं हुआ करता था। पल छीन में बरसात, बादल, धूप, सूरज और इन्द्रधनुष सब देख कर सारी इंद्रियां तृप्त और मन प्रसन्न हो जाया करता था।


फिर कभी-कभार जब हम चारों बहनों को छत पर एक साथ आसमान में दो इंद्रधनुष दिख जाया करता था तो ऐसा लगता है कि जैसे हमें कुबेर का खज़ाना मिल गया हो। आप सोच रहे होंगे ऐसा भला क्यों ? क्यूंकि हमनें कभी किसी को यूँ कहते सुना था – अगर एक साथ दो इंद्रधनुष दिख जाये तो तुरंत किसी कपड़े के टुकड़े में गांठ बांध कर कामना करने से वो कामना पूरी हो जाती है। ऐसा कर के हम चारों बहनों ने न जाने घर की कितनी ही चुन्नियों और रूमालों के कोनों में गांठ बाँधा होगा।अब यह तो मेरी माँ ही बता सकती है क्यूंकि वह आज तक इन गांठों का रहस्य नहीं समझ पायीं। और न हम चारों को यह याद है कि गांठ बांध कर हमारी कितनी मनोकामनाएं अब तक पूरी हुई हैं।

A rainbow hanging atop the hills as seen from my home in Dhanbad. Picture credit: Shruti

सियार का ब्याह क्यूँ कहा जाता था ये आज तक मालूम नहीं कर पाए – न हम और और न कोई और। ऐसा था हमारा बचपन और उसकी बारिशें।

(बारिशों के पानी, बचपन की यादों और हज़ारों अधूरी ख़्वाहिशों को सप्रेम समर्पित। क्यूंकि यह तीनों ही असंख्येय, अविस्मरणीय और अमूर्त हैं। Pictures provided by my sister Shruti from her recent Dhanbad trip; written by Shillpi | शिल्पी)