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Vanishing Tongues

The article was published in the edition dated November 6, 2022. https://www.freepressjournal.in/weekend/language-shift-and-reasons-why-languages-die

2021: A year of Love, Labour and Loss

Love is a mystery. Love is unitive. Love is how we connect as human beings with one another and with the whole universe together. Love is how we learn, become better, and make the world a better place to live for us and others. Love needs freedom to breathe, equality to thrive, and openness to flow and grow. Love is personal, political, philosophical, sexual, social, historical, metaphysical, transcendental, et al. Sadly, we have only one word to describe such a complex emotion. The ancient Greeks had six different words, but even that’s not enough. 2021 taught me new ways to describe the complexity of love and its various hues. Love lost on many counts, but it miraculously sprang on a few occasions like a phoenix. My LOVE vocabulary was defined and redefined by people who touched my life one way or another this year.



Like a jar of pickles, love is sweet, sour, tangy, and spicy. Love brings colour to your life, just like a jar of pickles makes your everyday meal delectable by adding flavour. Love and a jar of pickles take their own sweet time to ferment. If not preserved well, both a jar of pickles and love can get spoiled in no time.   

Homemaker Upasna Prasad has been pickling for as long as she remembers, especially during cold winter months. “It takes a lot of patience and time for the pickles to come out just right,” she says. We couldn’t agree more. It is ditto for love.


Why pickles?

“I have developed my system of learning good Bihari recipes for the past few years. And I have realised that unless I learn fast, the recipes of my grandmother, mother and mother-in-law will be lost forever. Who would send me these delectable achars? So I started pickling with fervour a couple of years, picking up the tips and tricks from them, and mastering the art in some measure.”

Pickling: My favourite winter past-time

“Karonda ka khatta-meetha achar is a sweet Bihari pickle that is a welcome change from regular pickles. When it is freshly made, this seasonal achar tastes best.

One can never match up to the flavour and aroma of homemade Barabar achar. As the name suggests, yam or jimikand (oal) achar is popularly known as Barabar achar since all the major ingredients used in this pickle are equal in quantities or proportions.

Bharwan lal mirch achar (stuffed red chilli pickle) is an integral recipe of any Bihari household. The market is flooded with this bright red delight during the winter months. What makes this pickle extraordinary is the tanginess of dry amchoor powder and the mild bitterness of mustard powder topping it with loads of mustard oil added as a pickling agent.

A mixed achar is one of the best Bihari pickles passed on from generation to generation with everlasting memories. Mostly fresh winter vegetables such as potato, brinjal, ginger, chilli, radish, carrot, cauliflower, and flat beans are blended perfectly with spices and mustard oil giving a tangy, zingy flavour. It needs to be soaked in the winter sun before it can be pronounced ready for consumption.

Lahsun ke patta ka achaar is another popular homemade Bihari pickle, enhancing the taste of the simplest food with its strong aroma and flavours. That’s the magic of green garlic!

How can one forget Amla (Indian gooseberry) achaar, which is nutrient-rich, loaded with iron and vitamin C in abundance, and easiest to prepare. The ingredients are simple too – amla, carrom seeds, turmeric, salt and oil to prepare. It is a must-have in winter to keep the cold at bay.”

Homegrown art 

“In Bihari pickles, we use a fine blend of roasted spices and oodles of mustard oil to ensure the pickle’s longevity. This delicate balance of spices and oil will make a fantastic pickle that will last for the whole year and not spoil.


Bihari pickles have a consistency close to a large rough chunk of the featured spices/ vegetables smothered in tangy (mostly mustard) oil and stained yellow colour from the inclusion of ground turmeric (haldi).

Among many Bihari families, pickles are a complete substitute to various recipes, as it requires no refrigeration and is ideal for long-distance journeys.

I love Bihari pickles as a side to most dal dishes and rice. Winter is the time to conjure up some sweet, spicy, sour and tangy pickles to accentuate any meal. These homemade pickles are good to eat and so easy to prepare that you will wonder why we ever buy them from grocery stores. There is something good about how pickles are prepared in Bihar and Jharkhand. The tartness combined with the spiciness is just perfect.”

A bite can tickle, be it a jar of pickles for your taste buds or love for your life. 

Rating: 1 out of 5.

‘धन’ और ‘धान’ की अतीत में सिसकता धनबाद

24 अक्टूबर को धनबाद के स्थापना दिवस पर उत्तम मुखर्जी का लेख

धनबाद कभी ‘धान’ की धरती था।धान उगलती धरती के कारण ही यहां के गांव-कस्बों का नाम खेतों की प्रकृति के अनुसार निर्धारित किए गए थे। मसलन कनाली, बाइद, बहियार, टांड़, आदि। रामकनाली, बहियारडीह, छाताबाद, छाताटांड़… आदि। यहां धान की उपज खूब होती थी। दामोदर, कतरी, कारी, खोदो..नदियों से घिरा था इलाका। पर्वत-पहाड़, वन-पाथर से आच्छादित एक मनोरम स्थल।बहियार खेतों में पानी सालोभर रहता था। बाइद खेतों की सिंचाई नदियों के पानी से होती थी। पहले धनबाद मानभूम जिले का हिस्सा था। उस समय बाइद खेत के अनुरूप धनबाद का नाम ‘धनबाइद’ था।
DHANBAID का मुख्यालय पुरुलिया था। वर्तमान में पुरुलिया पश्चिम बंगाल के हिस्से में है। धनबाद के सहायक उपायुक्त ADC बैठते थे। ICS लुबी साहब ADC थे। उन्होंने ही DHANBAID से I शब्द को विलोपित कर शहर का नाम धनबाद ..DHANBAD रखा।
भाषा के नाम पर भी यह शहर विवाद झेल चुका है।जो विवाद गहराया था वह बंगाल और बिहार के मुख्यमंत्रीद्वय डॉ विधान चन्द्र राय और श्रीकृष्ण सिंह की उदार भावना और पहल के बिना खत्म होना मुश्किल था। सन’ 1905 में बंग भंग आंदोलन हुआ । 1911 में इसे खारिज़ किया गया । वर्ष’ 1912 में मानभूम को बिहार-उड़ीसा के अधीन रखा गया। 1921 में मानभूम कांग्रेस का गठन हुआ । निवारण चन्द्र दासगुप्ता अध्यक्ष और अतुल चन्द्र घोष सचिव बने । आज़ादी के बाद मानभूम बिहार के हिस्से गया । ज़िला स्कूल में हिंदी का साइन बोर्ड लगाया गया ।हिंदी को जिले की भाषा बनाई गई। फिर भाषा आंदोलन शुरू हुआ । वर्ष’ 1948 में अध्यक्ष और सचिव समेत कांग्रेस के 35 सदस्यों ने हिंदी के विरोध में इस्तीफ़ा दिया । बांग्ला के समर्थन में लोक सेवक संघ का गठन हुआ। कोलकाता मार्च हुआ ।पाखेरबेड़ा का यह आंदोलन देश भर में चर्चित हुआ । बांग्ला के समर्थन में सत्याग्रह , हाल जोल और टुसू सत्याग्रह आंदोलन शुरू हुए। विवाद के नाम पर भाईचारे की कब्र खोदी जानी शुरू हो गई। बांग्ला-हिंदी मिलकर ‘जय हिंद’ के लिए कुर्बानी दी जा रही थी । अब दोनों भाषाएं आमने-सामने थीं । बाद में बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ विधान चन्द्र राय और बिहार के सीएम श्रीकृष्ण सिंह ने मिलकर राह आसान किए । 1956 के 24 अक्टूबर को 2007 वर्गमील क्षेत्र , 16 थाना मिलाकर मानभूम से पुरूलिया को अलग कर बंगाल का हिस्सा बनाया गया जबकि धनबाद को बिहार में रखा गया । उस समय बोकारो भी धनबाद का हिस्सा था। बाद में टिस्को के आग्रह पर बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ विधान चन्द्र राय ने धनबाद के साथ चांडिल , ईचागढ़ और पटमदा को भी बिहार के हवाले किए ।

मानभूम कल्चर आज भी धनबाद के गांवों में देखने को मिलता है। टुसू, भादू की पूजा आज भी यहां के गांवों में होती है।
मानभूम का जब विभाजन हुआ पणिक्कर कमीशन का गठन हुआ था। मानभूम के कौन सा इलाके को बंगाल को दिया जाए और कौन इलाका बिहार में रहे, इसे लेकर आयोग के सदस्य उलझन में रहे। बाद में उलूध्वनि(शादी में बंगाली समाज की महिलाएं एक ध्वनि निकालती है), अंडा-डिम, रस्सी-दड़ी, डोल-बाल्टी…इन शब्दों के सहारे सर्वे कर…चास रोड के दूसरे छोर के हिस्से को पुरुलिया में रखकर बंगाल को दिया गया। शेष हिस्से को धनबाद बनाकर बिहार का जिला बनाया गया।

धनबाद के सांसद पीआर चक्रवर्ती को जानिए…

मानभूम से ही अलग होकर धनबाद का गठन हुआ है। पीआर चक्रवर्ती यहां से एकबार सांसद रह चुके हैं । पीआर चक्रवर्ती नेहरूजी के करीबी रहे । एकबार उन्हें धनबाद से सांसद का टिकट मिल गया । हालांकि उनकी यहां कोई पहचान नहीं थी । लोगों को उम्मीद थी कि डीसी मल्लिक को कांग्रेस टिकट देगी । हालांकि चक्रवर्ती के पास नेहरूजी का एक पत्र था जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें वोट देना है। वह लेटर काफी चर्चे में आया था । लोग कहते हैं बिना पहचान के सिर्फ़ नेहरूजी के पत्र के सहारे पीआर चक्रवर्ती चुनावी वैतरणी पार कर गए थे । उस समय भी नेताओं के बीच नाराज़गी होती थी लेकिन लोग दुश्मन नहीं बनते थे । मल्लिक का टिकट कटने के बाद भी चक्रवर्ती उनके आवास में ही ठहरते थे और मल्लिक उन्हें मदद भी करते थे । पीआर चक्रवर्ती ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर
रहे । ढाका वर्तमान में बांग्लादेश की राजधानी है ।विभाजन के समय चक्रवर्ती मानभूम के पुरूलिया आ गए थे । वे एआईसीसी के सचिव भी बने बाद में देवघर स्थित अनुकूल ठाकुर के आश्रम में चले गए। फिर धनबाद की ओर कभी रूख नहीं किए।

भुला दिए गए आदिनाथ

आदिनाथ भूगर्भशास्त्री थे। वे NCDC की कोलियरियों में निदेशक भी थे। कोल माइनिंग फ्यूल रिसर्च इंस्टीच्यूट की स्थापना में भी उनकी भूमिका रही। जब सत्तर के दशक में चारी कमिटी की सिफारिश पर कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण हुआ, वे वैज्ञानिक पद्धति से खनन का प्रस्ताव दिए थे। उनके प्रस्ताव पर अमल नहीं हुआ। धनबाद का कोयला उद्योग आज मरणासन्न हो गया। आज जब अन्य कोयला कम्पनियां 100 मिलियन टन से ऊपर कोयला उत्पादन कर रही हैं। धनबाद स्थित BCCL 25 मिलियन टन में सिमट गई है। डेढ़ लाख से ऊपर मैनपावर BCCL में था। आज 39 हजार में सिकुड़ गया। फिर भी मज़दूर सरप्लस लग रहे। अगर आउटसोर्सिंग कम्पनियां न रहे तो कम्पनी खुद के बूते पर खड़ी नहीं रह सकती है। भारत-रूझ मैत्री के तहत खुले मुकुंदा प्रोजेक्ट और भारत-फ्रांस मैत्री के तहत शुरू किए गए लांग वाल मेकानाइज़्ड खदान अब अतीत की कहानी बन चुके हैं। झरिया, कतरास और केंदुआ शहर आग और भूधसान की चपेट में है।
धनबाद को गर्व है

धनबाद से निकले सुबोध जयसवाल आज CBI के निदेशक हैं। राकेश अस्थाना भी धनबाद के CBI SP रह चुके हैं। वीरेंद्र सिंह धनोआ ने सर्जिकल स्ट्राइक किया, उनका बचपन धनबाद में बीता। जस्टिस एसबी सिन्हा सुप्रीम कोर्ट के जज बने। धनबाद को इस बात पर भी गर्व हो सकता है कि कोकिंग कोल सिर्फ यही इलाका देता है। देश का दूसरा सबसे बड़ा राजस्व धनबाद रेल डिवीजन देता है ।CMPF, DGMS, ISM-IIT, CIMFR जैसी केंद्रीय संस्थाएं यहां हैं। लोगों को पीड़ा है कि आज भी धनबाद को एक अदद एयरपोर्ट नहीं मिला। एक बेहतर अस्पताल नहीं मिला। कई शहरों को जोड़नेवाले गया ब्रिज आज संकट में है। शहर के हृदयस्थल बैंक मोड़ से लेकर स्टेशन तक लोगों के लिए पैदल चलना भी मुश्किल है। तीन शहर अस्तित्व संकट से जूझ रहे हैं। यहां की प्रमुख भाषा खोरठा को आज भी उचित सम्मान नहीं मिला। लाखों फॉलोवर होने के बावजूद विनय तिवारी, मनोज देहाती जैसे लेखक-कलाकार को यथोचित सम्मान नहीं मिला। मिलेनियम सिटी बनाने का सपना टूटकर बिखर गया। रंगदारी, हत्या, कोयले के कारोबार पर कब्ज़ा… रोजमर्रे की बात है। कृषि तो कब का इतिहास बन चुकी है। न ‘धान’ और न ‘धन’ की धरती बन पा रहा धनबाद।

आदिवासी जननायक भगवान बिरसा मुंडा की १२१वीं पुण्यतिथि

महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, अन्याय, शोषण और अंग्रेजों की निरंकुशता के विरुद्ध क्रांतिकारी जन आंदोलन का आग़ाज करने वाले ‘आदिवासी जननायक’ भगवान बिरसा मुंडा को उनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि।

You are cordially invited to attend the wedding of dugwell and banyan tree

King Sri Krishnadevaraya wanted to organise the wedding of his royal well to find his wise advisor Tenali Rama, but a well is also wedded off in a colourful custom prevalent in Bihar and Jharkhand. 

The last you would have heard of a well’s wedding was in the folklore of Tenali Rama. Once upon a time, it had so happened that King Sri Krishnadevaraya and his wise advisor Tenali Rama had a spat over some trivial issue, following which the King banished him from the royal court. After this episode, Tenali Rama left the kingdom and moved to a nondescript village. Soon, the King realised that Tenali Rama was, in fact, correct, and he was keen to have him back in his court. But his special advisor was nowhere to be found. To look for him, the King had to use his wits. An announcement was made saying that the King had organised the royal well’s wedding in his capital Vijayanagar on the full moon night, and the village panchayats in his kingdom were cordially invited to attend the same with their wells in tow. The King wouldn’t tolerate any defiance, and if the villagers failed to bring their wells along for the wedding, they would be penalised 100 gold coins. The harried villagers sought Tenali Rama’s advice. He suggested that they meet the King the following day and tell him that the village wells would attend the wedding for sure, but only if the royal well comes and invites them personally. The King knew that it could be only his witty courtier Tenali Rama, who could give the villagers this suggestion to outwit the King’s proposed well’s wedding plan, and well, eventually both won the battle of wits in equal measure.  

Taking a leaf out of this folklore, a quaint neighbourhood — Vikas Nagar — in Ward no 8 of the Barh subdivision of Patna district organised a wedding of its well with great pomp and show on November 28, 2019.

Sharmila Kumari, Vikas Mitra of Ward no 8, Barh.
Read more here: https://en.gaonconnection.com/well-wedding-jharkhand-bihar-water/

Adam Imam: The standout star from Jharkhand

Shillpi A Singh

In your name, the family name is at last because it’s the family name that lasts,” wrote author, professional magician and mentalist Amit Kalantri in his book Wealth of Words. Well, the young and talented Adam Christopher Imam, 21, from Hazaribagh in Jharkhand couldn’t agree more with his statement. After all, he comes from one of India’s most distinguished families, which has produced a steady stream of intellectuals for the past two centuries.

Adam is the son of Justin and Alka Imam, the grandson of Padma Shri Bulu Imam and Syed Hasan Imam’s great-grandson. The enviable family lineage has made him conscious because with great power comes great responsibility, and he is aware of both – power and its responsibilities. “My great grandfather was the president of the Indian National Congress in 1918. My parents are founders of Virasat Trust while my grandfather is an environmentalist and social worker who was honored with the Gandhi Peace Award in 2011. I have seen them work so hard for the revival and resurgence of Kohvar and Sohrai paintings in and around Hazaribagh, Jharkhand, all through my growing up years. It is thanks to them that Kohvar and Sohrai paintings bagged the GI tag,” says the youngest Imam, highlighting his illustrious family’s history.    

Adam with his parents – Justin and Alka- and sister Eva.

An alumnus of St Xavier’s School, Hazaribagh, Adam is currently pursuing a bachelor’s degree in travel and tourism management from Chandigarh University. The choice of the subject was obvious. “I come from a family that has devoted itself to the preservation of Jharkhand’s art, culture and tourism. I would like to contribute towards enriching their legacy, and my love for travelling is another reason,” says the travel buff. 

His last trip to the Land of Pyramids & Pharaohs in June 2019 was an enchanting experience. “I was in Egypt for 45 days as a global youth volunteer for a cultural exchange program. I travelled across the country and explored more than eight big cities during my trip,” he adds. The young lad is different from others of his ilk; his fondness and pride for his state, and all things Jharkhand is remarkable. “It comes from my parent’s grounded upbringing. I’ve always been taught to embrace our culture and stay connected to our roots because only a tree with strong roots laughs at storms,” he quips. Adam took it upon himself to ‘educate’ his ignorant classmates and faculty at his College about his home state’s richness. He flaunts his Jharkhand tag with immense pride. He loves dressing up in the traditional attire, and quite often.   

He can count on his attitude and aptitude and these alone will go a long way in helping him carve a niche in the tourism sector. The young boy is angling for his moment in the spotlight and has the personality and charm to be the standout face 2021 from Jharkhand. Watch out world, here comes Adam Christopher Imam. 

Adam Christopher Imam.