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‘धन’ और ‘धान’ की अतीत में सिसकता धनबाद

24 अक्टूबर को धनबाद के स्थापना दिवस पर उत्तम मुखर्जी का लेख

धनबाद कभी ‘धान’ की धरती था।धान उगलती धरती के कारण ही यहां के गांव-कस्बों का नाम खेतों की प्रकृति के अनुसार निर्धारित किए गए थे। मसलन कनाली, बाइद, बहियार, टांड़, आदि। रामकनाली, बहियारडीह, छाताबाद, छाताटांड़… आदि। यहां धान की उपज खूब होती थी। दामोदर, कतरी, कारी, खोदो..नदियों से घिरा था इलाका। पर्वत-पहाड़, वन-पाथर से आच्छादित एक मनोरम स्थल।बहियार खेतों में पानी सालोभर रहता था। बाइद खेतों की सिंचाई नदियों के पानी से होती थी। पहले धनबाद मानभूम जिले का हिस्सा था। उस समय बाइद खेत के अनुरूप धनबाद का नाम ‘धनबाइद’ था।
DHANBAID का मुख्यालय पुरुलिया था। वर्तमान में पुरुलिया पश्चिम बंगाल के हिस्से में है। धनबाद के सहायक उपायुक्त ADC बैठते थे। ICS लुबी साहब ADC थे। उन्होंने ही DHANBAID से I शब्द को विलोपित कर शहर का नाम धनबाद ..DHANBAD रखा।
भाषा के नाम पर भी यह शहर विवाद झेल चुका है।जो विवाद गहराया था वह बंगाल और बिहार के मुख्यमंत्रीद्वय डॉ विधान चन्द्र राय और श्रीकृष्ण सिंह की उदार भावना और पहल के बिना खत्म होना मुश्किल था। सन’ 1905 में बंग भंग आंदोलन हुआ । 1911 में इसे खारिज़ किया गया । वर्ष’ 1912 में मानभूम को बिहार-उड़ीसा के अधीन रखा गया। 1921 में मानभूम कांग्रेस का गठन हुआ । निवारण चन्द्र दासगुप्ता अध्यक्ष और अतुल चन्द्र घोष सचिव बने । आज़ादी के बाद मानभूम बिहार के हिस्से गया । ज़िला स्कूल में हिंदी का साइन बोर्ड लगाया गया ।हिंदी को जिले की भाषा बनाई गई। फिर भाषा आंदोलन शुरू हुआ । वर्ष’ 1948 में अध्यक्ष और सचिव समेत कांग्रेस के 35 सदस्यों ने हिंदी के विरोध में इस्तीफ़ा दिया । बांग्ला के समर्थन में लोक सेवक संघ का गठन हुआ। कोलकाता मार्च हुआ ।पाखेरबेड़ा का यह आंदोलन देश भर में चर्चित हुआ । बांग्ला के समर्थन में सत्याग्रह , हाल जोल और टुसू सत्याग्रह आंदोलन शुरू हुए। विवाद के नाम पर भाईचारे की कब्र खोदी जानी शुरू हो गई। बांग्ला-हिंदी मिलकर ‘जय हिंद’ के लिए कुर्बानी दी जा रही थी । अब दोनों भाषाएं आमने-सामने थीं । बाद में बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ विधान चन्द्र राय और बिहार के सीएम श्रीकृष्ण सिंह ने मिलकर राह आसान किए । 1956 के 24 अक्टूबर को 2007 वर्गमील क्षेत्र , 16 थाना मिलाकर मानभूम से पुरूलिया को अलग कर बंगाल का हिस्सा बनाया गया जबकि धनबाद को बिहार में रखा गया । उस समय बोकारो भी धनबाद का हिस्सा था। बाद में टिस्को के आग्रह पर बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ विधान चन्द्र राय ने धनबाद के साथ चांडिल , ईचागढ़ और पटमदा को भी बिहार के हवाले किए ।

मानभूम कल्चर आज भी धनबाद के गांवों में देखने को मिलता है। टुसू, भादू की पूजा आज भी यहां के गांवों में होती है।
मानभूम का जब विभाजन हुआ पणिक्कर कमीशन का गठन हुआ था। मानभूम के कौन सा इलाके को बंगाल को दिया जाए और कौन इलाका बिहार में रहे, इसे लेकर आयोग के सदस्य उलझन में रहे। बाद में उलूध्वनि(शादी में बंगाली समाज की महिलाएं एक ध्वनि निकालती है), अंडा-डिम, रस्सी-दड़ी, डोल-बाल्टी…इन शब्दों के सहारे सर्वे कर…चास रोड के दूसरे छोर के हिस्से को पुरुलिया में रखकर बंगाल को दिया गया। शेष हिस्से को धनबाद बनाकर बिहार का जिला बनाया गया।

धनबाद के सांसद पीआर चक्रवर्ती को जानिए…

मानभूम से ही अलग होकर धनबाद का गठन हुआ है। पीआर चक्रवर्ती यहां से एकबार सांसद रह चुके हैं । पीआर चक्रवर्ती नेहरूजी के करीबी रहे । एकबार उन्हें धनबाद से सांसद का टिकट मिल गया । हालांकि उनकी यहां कोई पहचान नहीं थी । लोगों को उम्मीद थी कि डीसी मल्लिक को कांग्रेस टिकट देगी । हालांकि चक्रवर्ती के पास नेहरूजी का एक पत्र था जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें वोट देना है। वह लेटर काफी चर्चे में आया था । लोग कहते हैं बिना पहचान के सिर्फ़ नेहरूजी के पत्र के सहारे पीआर चक्रवर्ती चुनावी वैतरणी पार कर गए थे । उस समय भी नेताओं के बीच नाराज़गी होती थी लेकिन लोग दुश्मन नहीं बनते थे । मल्लिक का टिकट कटने के बाद भी चक्रवर्ती उनके आवास में ही ठहरते थे और मल्लिक उन्हें मदद भी करते थे । पीआर चक्रवर्ती ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर
रहे । ढाका वर्तमान में बांग्लादेश की राजधानी है ।विभाजन के समय चक्रवर्ती मानभूम के पुरूलिया आ गए थे । वे एआईसीसी के सचिव भी बने बाद में देवघर स्थित अनुकूल ठाकुर के आश्रम में चले गए। फिर धनबाद की ओर कभी रूख नहीं किए।

भुला दिए गए आदिनाथ

आदिनाथ भूगर्भशास्त्री थे। वे NCDC की कोलियरियों में निदेशक भी थे। कोल माइनिंग फ्यूल रिसर्च इंस्टीच्यूट की स्थापना में भी उनकी भूमिका रही। जब सत्तर के दशक में चारी कमिटी की सिफारिश पर कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण हुआ, वे वैज्ञानिक पद्धति से खनन का प्रस्ताव दिए थे। उनके प्रस्ताव पर अमल नहीं हुआ। धनबाद का कोयला उद्योग आज मरणासन्न हो गया। आज जब अन्य कोयला कम्पनियां 100 मिलियन टन से ऊपर कोयला उत्पादन कर रही हैं। धनबाद स्थित BCCL 25 मिलियन टन में सिमट गई है। डेढ़ लाख से ऊपर मैनपावर BCCL में था। आज 39 हजार में सिकुड़ गया। फिर भी मज़दूर सरप्लस लग रहे। अगर आउटसोर्सिंग कम्पनियां न रहे तो कम्पनी खुद के बूते पर खड़ी नहीं रह सकती है। भारत-रूझ मैत्री के तहत खुले मुकुंदा प्रोजेक्ट और भारत-फ्रांस मैत्री के तहत शुरू किए गए लांग वाल मेकानाइज़्ड खदान अब अतीत की कहानी बन चुके हैं। झरिया, कतरास और केंदुआ शहर आग और भूधसान की चपेट में है।
धनबाद को गर्व है

धनबाद से निकले सुबोध जयसवाल आज CBI के निदेशक हैं। राकेश अस्थाना भी धनबाद के CBI SP रह चुके हैं। वीरेंद्र सिंह धनोआ ने सर्जिकल स्ट्राइक किया, उनका बचपन धनबाद में बीता। जस्टिस एसबी सिन्हा सुप्रीम कोर्ट के जज बने। धनबाद को इस बात पर भी गर्व हो सकता है कि कोकिंग कोल सिर्फ यही इलाका देता है। देश का दूसरा सबसे बड़ा राजस्व धनबाद रेल डिवीजन देता है ।CMPF, DGMS, ISM-IIT, CIMFR जैसी केंद्रीय संस्थाएं यहां हैं। लोगों को पीड़ा है कि आज भी धनबाद को एक अदद एयरपोर्ट नहीं मिला। एक बेहतर अस्पताल नहीं मिला। कई शहरों को जोड़नेवाले गया ब्रिज आज संकट में है। शहर के हृदयस्थल बैंक मोड़ से लेकर स्टेशन तक लोगों के लिए पैदल चलना भी मुश्किल है। तीन शहर अस्तित्व संकट से जूझ रहे हैं। यहां की प्रमुख भाषा खोरठा को आज भी उचित सम्मान नहीं मिला। लाखों फॉलोवर होने के बावजूद विनय तिवारी, मनोज देहाती जैसे लेखक-कलाकार को यथोचित सम्मान नहीं मिला। मिलेनियम सिटी बनाने का सपना टूटकर बिखर गया। रंगदारी, हत्या, कोयले के कारोबार पर कब्ज़ा… रोजमर्रे की बात है। कृषि तो कब का इतिहास बन चुकी है। न ‘धान’ और न ‘धन’ की धरती बन पा रहा धनबाद।